केविन रूए इस समय दो अहम भूमिकाएँ एक साथ निभा रहे हैं: टेस्ट स्तर पर कनाडा का नेतृत्व करना और प्रीमियरशिप वूमेन्स रग्बी में सरासेन्स के आक्रमण कोच के रूप में काम करना। इस ओवरलैप ने ध्यान खींचा है, क्योंकि जिन इंग्लैंड खिलाड़ियों का सामना करने की उन्होंने हाल ही में तैयारी की थी, उनमें से कुछ अब क्लब स्तर पर उनके साथ काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, RFU ने इस व्यवस्था के बाद इंग्लैंड महिलाओं के कुछ प्रशिक्षण डेटा को साझा न करने का फैसला किया, जो सामान्य रूप से PWR क्लबों के साथ साझा किया जाता है, क्योंकि उसे आशंका थी कि इससे कनाडा को फायदा हो सकता है। रूए का तर्क है कि इस आदान-प्रदान से इंग्लैंड को भी कम फायदा नहीं मिलता, क्योंकि सरासेन्स में उनका काम क्लब के खिलाड़ियों और स्टाफ को कनाडा की रग्बी सोच से भी परिचित कराता है।
बड़ा मुद्दा सिर्फ एक कोच तक सीमित नहीं है। PWR अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा का बड़ा केंद्र बन चुका है, जहाँ कनाडा के कई खिलाड़ी और अमेरिका, न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया व फ़्रांस की खिलाड़ी अंग्रेज़ी क्लबों के ज़रिए हर हफ़्ते उच्च-स्तरीय प्रतिस्पर्धा में हिस्सा ले रही हैं। इससे लीग को ताकत मिलती है, लेकिन साथ ही उन उभरते हुए English-qualified खिलाड़ियों के अवसरों पर भी सवाल उठते हैं, भले ही स्क्वाड-औसत नियम मौजूद हो।
अब यह कहानी सिद्धांत से प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रही है। कनाडा को शरद ऋतु में इंग्लैंड से तीन बार भिड़ना है, जबकि सरासेन्स की तात्कालिक प्राथमिकता PWR सेमीफ़ाइनल में एक्सेटर के खिलाफ मुकाबला है। संपादकों के लिए मुख्य सवाल यह है कि क्या सीमापार कोचिंग और खिलाड़ी-आवागमन को प्रतिस्पर्धी जोखिम माना जाए, विकास का साधन, या दोनों।


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